कौन थे आर्यभट्ट ? A small introduction of great Aryabhatt.

कौन थे आर्यभट्ट

ग्रहों, नक्षत्रों की वैज्ञानिक व्याख्या करने वाले प्रसिद्ध ज्योतिषी व गणितीय आर्यभट्ट हमारे देश में हुए है। पूरे विश्व को शून्य सहित दस अंक संकेतक से परिचित कराने वाले आर्यभट्ट का जन्म दक्षिणीपथ में गोदावरी नदी के सुरम्य तट पर बसे अश्मक जनपद में हुआ था । बाल्यकाल से ही आर्यभट्ट बेहद कुशाग्र बुद्धि के थे। गणित वा ज्योतिषी में उनकी गहन रुचि थी। इसमें पांडित्य प्राप्त करने हेतु वे पाटलिपुत्र पहुंच गए । आर्यभट्ट ने पुरानी मान्यताओं को दूर करते हुए नक्षत्रों के बारे में अपने गहन शोध के द्वारा कई मान्यताएं लोगो को बतलाई। उस युग में अंधविश्वास के चलते लोग ग्रह के समय मानते थे कि राहू ने चंद्रमा या सूर्य को निगल लिया है। स्नान, दान- पुण्य का सिलसिला शुरू हो जाता था लेकिन युवा ज्योतिषी आर्यभट्ट ने ग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए बताया कि पृथ्वी कि बड़ी प्रतिछाया जब चंद्रमा पर पड़ती है जब चन्द्र ग्रहण होता है । चंद्रमा जब धरती वा सूर्य के बीच आ जाता है तब सूर्य ग्रहण होता है। पारंपरिक अंधविश्वास के खिलाफ युद्ध लड़ने के कारण ही इनका आर्यभट्ट रखा गया था ।

‘ भट्ट ‘ यानी योद्धा। आर्यभट्ट ने यह भी सिद्ध के बतलाया कि पृथ्वी स्थिर नहीं है। वह अपनी धुरी पर चक्कर लगाती रहती है। आकाश का तारामंडल स्थिर है, आर्यभट्ट की सबसे बड़ी उपलब्धि रही है शून्य सहित केवल दस अंक संकेतो से संख्याओं कि अभिव्यक्ति करना। आर्यभट्ट ने अपनी संस्कृत में लिखी पुस्तक ‘ आर्यभटीय ‘ से प्रारंभ में ही वृंद ( 1000000000 ) यानी अरब तक दस गुणोत्तर संख्या देकर प्रतिपादित किया कि इनमें प्रत्येक स्थान अपने पिछले अंक से दस गुना है ।

प्रसिद्ध ज्योतिषी वा गणितज्ञ आर्यभट्ट के नाम से ही भारत के प्रथम कृत्रिम उपग्रह को 19 अप्रैल 1975 में अंतरिक्ष से छोड़ा गया । आज भी आर्यभट्ट का नाम गणित वा ज्योतिष के क्षेत्र में भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है, जो हमारी युवा वा बाल पीढ़ी को सदैव प्रेरणा प्रदान करता रहेगा।

आर्यभट का योगदान

भारत के इतिहास में जिसे ‘गुप्तकाल’ या ‘स्वर्णयुग’ के नाम से जाना जाता है, उस समय भारत ने साहित्य, कला और विज्ञान क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की। उस समय मगध स्थित नालन्दा विश्वविद्यालय ज्ञानदान का प्रमुख और प्रसिद्ध केंद्र था। देश विदेश से विद्यार्थी ज्ञानार्जन के लिए यहाँ आते थे। वहाँ खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था। एक प्राचीन श्लोक के अनुसार आर्यभट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे।

आर्यभट का भारत और विश्व के ज्योतिष सिद्धान्त पर बहुत प्रभाव रहा है। आर्यभट भारतीय गणितज्ञों में 0सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन्होंने 120 आर्याछंदों में ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांत और उससे संबंधित गणित को सूत्ररूप में अपने आर्यभटीय ग्रंथ में लिखा है।



आर्यभट ने ज्योतिषशास्त्र के आजकल के उन्नत साधनों के बिना जो खोज की थी,यह उनकी महत्ता है। कोपर्निकस (1473 से 1543 ई.) ने जो खोज की थी उसकी खोज आर्यभट हजार वर्ष पहले कर चुके थे। “गोलपाद” में आर्यभट ने लिखा है “नाव में बैठा हुआ मनुष्य जब प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है, तब वह समझता है कि अचर वृक्ष, पाषाण, पर्वत आदि पदार्थ उल्टी गति से जा रहे हैं। उसी प्रकार गतिमान पृथ्वी पर से स्थिर नक्षत्र भी उलटी गति से जाते हुए दिखाई देते हैं।” इस प्रकार आर्यभट ने सर्वप्रथम यह सिद्ध किया कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है। इन्होंने सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग को समान माना है। इनके अनुसार एक कल्प में 14 मन्वंतर और एक मन्वंतर में 72 महायुग (चतुर्युग) तथा एक चतुर्युग में सतयुग, द्वापर, त्रेता और कलियुग को समान माना है।

आर्यभट ने बड़ी-बड़ी संख्याओं को अक्षरों के समूह से निरूपित करने कीत्यन्त वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया है।

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