बचपन की यादें वो पल जो अब कभी लौट कर नहीं आने वाली। आखिर क्यों याद आते है? वो पल। जिनकी हम सब करना चाहते बातें। वो बचपन का पल,जिस पल में हम बड़े होने के सपने देखा करते थे। कि हम कब बड़े होंगे। और आज उस bachpan ki yaadein जब सच हो गई।

हम बड़े हो गए , तो उस बचपन में फिर जाने को सोचते हैं। कि काश एक बार फिर वो बचपन वापस आ सके।

Bachpan ki yaadein का जीवन में फिर से लुफ्त उठा पाए। वो शैतानियां , वो नादानियां , वो भोलापन दूसरों को परेशान करना। वो दोस्तो की यारी जो लगती थी प्यारी। वो स्कूलों के दिन जिसे भूल नहीं कभी हम। ये सब एक बार फिर अच्छे से कर पाते।

लेकिन ये शायद संभव नहीं है,लेकिन कुछ एहसासों के सहारे आओ मिल कर हम, कुछ पल उन यादों में चलते है। जहां कुछ आप और कुछ हम अपनी यादों को करेंगे मिलकर बात।

एक छोटी से कविता के माध्यम से उस बचपन में जाने कि कोशिश करेंगे,जिससे वापस जिसको भूल पाना असंभव है। अगर आप तक ये कविता पहुंचे। तो बताइए जरूर , चलो तो फिर चलते है।

 

बचपन की यादें
                          बचपन की यादें

बचपन की यादें :- कविता

जब था बचपन

ना था, कंधे पर कोई बोझ

हंसते-हंसते कटता था हर रोज।

वों स्कूल की शैतानी,

वों हम लड़कों की नादानी,

वों अध्याप का प्यार

फिर उन्हीं की फटकार,

आ जाओ मेरे यार

फिर करते हैं, उन दिनों की बात।

जब था बचपन,

ना था कंधे पर कोई बोझ,

हंसते-हंसते कटता था हर रोज।

वों मां के हाथ का खाना,

जिसका हर दोस्त था दीवाना,

वों रोटियों का छीनना,

वों टिफिन ही लेकर गायब हो जाना।

वों छुट्टी का इंतजार

बैग बंद करने को, पहले से तैयार

वों घंटी का बजना,

छोटे से बड़े का लाइन में लगना,

रेलगाड़ी जैसा छुक छुक करना,

लाइन तोड़ कर आगे आना

अध्यापक की डांट, पीछे हट जाना।

क्लास की उस लड़की की अदा,

जो हर दिल पर, हो जाती फिदा

ना करती वों, किसी को प्यार

फिर भी देखो ना करती वो इन्कार।

स्कूल की वो सड़के,

जिस पर रहते थे लड़ते।

फिर अध्यापकों का चिल्लना,

हमारा झगड़ा दोस्ती में बदल जाना।

घर से कोसों की दूरी

वो कब कटता था, सफर

हमे उसकी होती ही ना थी, खबर

ना हमें थी,कोई फिक्र

बस करते रहते थे,अपना ही जिक्र।

हमारी वो नादानी

जो बनती थी,सबके लिए परेशानी,

स्कूल से घर का आना,

फिर खेलने चले जाना

ना जाने अब क्यों आता है, याद

ये सब अब यादे हो गई,मेरे यार।

जब था बचपन

ना था कंधे पर कोई बोझ।

Bachpan ki yaadein वो भी दोस्तो के साथ कुछ अलग ही वो यादें होती है। आज भी वो बचपन का पल याद है मुझे। जब हम सभी दोस्त स्कूल जाते थे। और प्रार्थना शुरू होने से पहले स्कूल के अंदर छुपके से चले जाया करते थे, और अंदर ही खेलते थे। कहीं लुक्का – छुप्पी , पकड़म – पकड़ाई तो कहीं लात्ती मर खेल। जब किसी को पता चलता की हम लोग अंदर छुप कर आ गए है। तो सभी दोस्त अपनी – अपनी किताबें खोल कर बैठ जाते और पढ़ने का नाटक करते। ताकि देखने वाले को लगे की हम लोग पढ़ने के लिए स्कूल के अंदर जल्दी आ गए है।

वो बचपन की नादानियां टिफिन को लेकर लड़ाई करना और टिफिन लेकर भाग जाना। और वो साइकिल की सवारी जिसके आगे हम किसीको को कुछ समझते नहीं थे।

लोगो के घरों की घंटी (bell) बजाकर भाग जाना। ऐसी तमाम नादानियां जो अब सिर्फ यादों ओर बातो में रह गई।

उन पलों को जब याद करता हूं,तो बस आंखो में आंसू ओर हाथो में कलम लेकर उन पलों को याद कर पन्नों में समेट लेता हूं। इन्हीं पलों से श्री जगजीत सिंह जी द्वारा बस वो गीत याद आते है। कि

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो।

भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी।

मगर मुझको लौटा दो, बचपन का सावन।

वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।

सही में वो बचपन ही होता है। जो बिना फिक्र के दिन भर घूमना-खेलना ना कोई बोझ बस हम तो,अपनी मस्ती में सवार। जब बचपन था, तब कहते थे जल्दी बड़े हो जाए। आज जब बड़े हो गए है। तो bachpan ki yaadeinती हैं। और अपनी बचपन में की हुई नादानियों को याद कर सोचते है,काश उस बचपन को एक बार और लुफ्त उठा पाते।

आशा करता हूं। कि आप सभी को मेरी लिखी हुई कविता पढ़ कर अपने- अपने bachpan ki yaadein के किसी एक भी पल को जिया होगा। तो मेरी लिखी हुई ये कविता सफल हो जाएगी। अगर आपको सच में थोड़ा सा भी अच्छा लगा हो,तो आप कॉमेंट करके एक बार जरूर बताईए और दूसरो तक इस खूसूरत बचपन के पल को जरूर (share) पहुंचाएं। अपनी बचपन की नादानियां,यादें थोड़े से शब्दों में लिखकर जरूर बयां करे। आपकी प्रतिलिपि (कमेंट) हमारे लिए बहुमूल्य है।

धन्यवाद!

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